आवारगी के साथ भटकती रही जिन्दगी
रात तन्हाई में सिसकती रही जिन्दगी
किसी पथरीली राह में मोहब्बत बनकर
नरम शोलों सी पिघलती रही जिन्दगी
बोझिल कदमो से बेइरादा मंजिलों पर
कभी चली तो कभी रुकी सी रही जिन्दगी
किसी ने आवाज दी जरा जो प्यार से
उस ओर दीवानावार चलती रही जिन्दगी
दोस्तों की रहनुमाई हर मौज के साथ साथ
बस ख्वावों से ही बहलती रही जिन्दगी
उधार की चंद कालिया चुनकर भी देखो
बीच आंसुओ के भी महकती रही जिन्दगी
पहला शेर दिल तक उतरता है
ReplyDeleteखूबसूरत , आपकी कई रचनाये पढ़ नहीं पाया अब जल्द ही देखता हूँ '
उधार की चंद कालिया चुनकर भी देखो
ReplyDeleteबीच आंसुओ के भी महकती रही जिन्दगी
वाह ...बहुत खूब
कितना कुछ निहित है इन पंक्तियों में !
बेहद सुन्दर
आभार सहित
आप की रचना भावों के दृष्टिकोण से उत्कृष्ट है लेकिन कला पक्ष कमजोर है. आप सीखने की ओर उन्म्मुख नहीं हैं और यही ऐसी चीज़ है जो आपकी प्रतिभा पर ग्रहण लगा रही है. आप बगैर सीखे, कविता को सुन्दरता नहीं दे सकतीं. सीखना कोई गलत काम नहीं. मैं समझता हूँ हम अंतिम सांस तक सीखते रहते हैं. कोई व्यक्ति पूर्ण नहीं होता, जिसने स्वयं को पूर्ण मान लिया, समझें उसकी मौत हो गयी. अपनी प्रतिभा के साथ न्याय करें. आशा है आप मेरी बातों को अन्यथा नहीं लेंगी. आप की रचना भावों के दृष्टिकोण से उत्कृष्ट है लेकिन कला पक्ष कमजोर है. आप सीखने की ओर उन्म्मुख नहीं हैं और यही ऐसी चीज़ है जो आपकी प्रतिभा पर ग्रहण लगा रही है. आप बगैर सीखे, कविता को सुन्दरता नहीं दे सकतीं. सीखना कोई गलत काम नहीं. मैं समझता हूँ हम अंतिम सांस तक सीखते रहते हैं. कोई व्यक्ति पूर्ण नहीं होता, जिसने स्वयं को पूर्ण मान लिया, समझें उसकी मौत हो गयी. अपनी प्रतिभा के साथ न्याय करें. आशा है आप मेरी बातों को अन्यथा नहीं लेंगी. आप की रचना भावों के दृष्टिकोण से उत्कृष्ट है लेकिन कला पक्ष कमजोर है. आप सीखने की ओर उन्म्मुख नहीं हैं और यही ऐसी चीज़ है जो आपकी प्रतिभा पर ग्रहण लगा रही है. आप बगैर सीखे, कविता को सुन्दरता नहीं दे सकतीं. सीखना कोई गलत काम नहीं. मैं समझता हूँ हम अंतिम सांस तक सीखते रहते हैं. कोई व्यक्ति पूर्ण नहीं होता, जिसने स्वयं को पूर्ण मान लिया, समझें उसकी मौत हो गयी. अपनी प्रतिभा के साथ न्याय करें. आशा है आप मेरी बातों को अन्यथा नहीं लेंगी.
ReplyDeleteबहुत खूब - संवेदनशील प्रस्तुति
ReplyDeleteबचाई क्यो सांसे जब मैं मर गया था
ReplyDeleteखड़ा था वो दर पे बाहे फ़ैलाये
देता उसे क्या जब खुद लूट गया था
फिरता था खुद से नजरें चुराए
उसकी वफ़ा से भी जी भर गया था