
खामोशी की भी अलग अपनी जुबां होती है
दरिया की मंजिल सिर्फ़ सागर मिलन होती है
किसको आवाज देता है अब तक वो मुसाफिर
क्या फरिश्तो की आमद कभी सेहरा में होती है
हर मंजिल एक नई राह पे आकर गुम हों गई
इंशा की चाहे वो है जो न कभी ख़तम होती है
पर्वतों पे देखा है उस अस्मा को भी उतरते हुए
तनहा जब वो रोता है तब ही बारिश होती है
किसको फुर्सत थी पलकों की शबनम चुनने की
हर नजर में फूलो के शबाब की चर्चा होती है
कभी धड़कने सुलगती शोला सा भड़कता शब् भर
सिर्फ़ इश्क नही और भी मजबुरिया होती है
बहुत संभल कर चले जाने क्यो राहों में डरे ये
महक की गुलशन में चंद पल ही सांसे होती है .