
मै उसके वास्ते गुलशन से चंद कलियाँ क्या लाता
उस रोशनी के आगे कैसे कोई दूसरी शमां जलाता
मै सजदा किया करूँ वो मेरा बस हमनवां ही रहे
कैसे उसे अपने खयालो से भी दूर कर पाता
अजीज़ तो बहुत थे काफिलों की कमी न थी मगर
आज भी तेरे मुकाबिल कहाँ किसी को हूँ पाता
बहुत एतराज था नापैगामे अंदाज से अक्सर
कैसे उसके मुखातिब कोई हँसी पैगाम लिख पाता
ये रोज रोज के वही मंजर उकताते हुए सभी को
महक बहारो के झूठे स्वप्न कैसे उसे मै दिखाता
bahut khoob
ReplyDeleteआपकी ग़ज़ल का मतला ही जानलेवा होता है
ReplyDeleteबाकि सभी शेर आपके भीतर की खूबसूरती को परिभाषित करते हैं.
umda
ReplyDeletekomal
sundar abhivyakti !